Monday, 10 August 2015

जन्मों से परे 171114



तुम्हारे ही मुख पर आ कर ठहर गयी थी मेरी निगाह
कुछ बहुत परिचित सा था वहाँ
क्या था
तुम्हारी आँखें
तुम्हारी नाक
या तुम्हारी वो मुस्कान
तुम्हारी आँखें भी तो चमक उठी थी
मेरी आँखों से मिलकर
हल्का सा मुस्कराई थी तुम भी ,
या मुझे गुमान हुआ था
इतने अपरिचित समूह के बीच
तुम्ही क्यों अलग लगी थी
जैसे के कमल अदबुध लगा है तल में
या जैसे की पूरन चाँद
ही देखता हो आकाश में
अवाक रह गया था मैं
सोच रहा वो क्या था
क्यों मिलाया था प्रकृति ने हमें ऐसे
कोई नया यूँ ही मिल गया था
या कोई जन्मों पुराना
रिश्ता फिर जी उठा था

17 nov 2014

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