Monday, 10 August 2015

वक़्त 090815

चेहरे बदल जाते हैं
बीतते वक़्त के साथ
बरसो नहीं मिलते हम जिन्हे 
वो क्यों अजनबी नहीं लगते
इतने वक्फे के बाद भी
इस नये चहरे मे भी
दिख जाता है वो ही पुराना
और चल पड़ता है
यादो का एक लंबा सिलसिला
खुलती जाती है फेहरिस्त
हज़ारो बिन्दुओ की
एक एक बिंदु समेटे हैं
एक अनोखी कहानी लौट जाता हूँ
बचपन की उस बेला मे
जब पहली बार बुलाया था
और मुड़कर देखा था उसने
नहीं भूल पाया हू मै
वो भाव उसका
वही तो चेहरा याद है।


9 अगस्त 2015



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