Wednesday, 19 August 2015

मुस्कराहट 180815

यु सुबह सुबह बारिश की बूंदे
याद तेरी ले आती है
उमड़ते बादलो की मद्धम रौशनी
तेरा चेहरा बनाती है
देख पाता हू तुम्हे
बैठे यू अकेले
उसी बादल को तकते
और ये हवा जो तेरे चेहरे को छू कर
यू गुज़री है
मेरा यह आँगन भर गया है
तेरी खुशबु से
शायद एक लम्हा
मैं भी गुज़रा हू तेरे ज़ेहन से
इसी उन्मीद मे
फिर देखता हू ऊपर बादल की और
कि दिख जाये तुम्हारे चहरे पर
मुस्कराहट की एक लकीर।
ललित 18 अगस्त 2015

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