Monday, 10 August 2015

मंजिल 040491

में चला जो था तेरे साथ साथ
मुझे रास्तो का पता न था
मुझे हमसफ़र की तलाश थी
मुझे मंजिलो का फिक्र न था
मेरे पाव थे ज़मीन पर
मेरी यह नज़र तो तुझी पे थी
में रास्ता क्या देखता
मुझे तुझ पे ऐतबार था I
पहुंचा हु यहाँ जो आज में
यह मंजिले है कौन सी
मेरा रास्ता तो ठीक था
यह मंजिले क्यों और है
मंजिल पे नहीं था पहुंचना
तो मेरे साथ हुआ क्यों था
वोह दोस्ती,वोह चाहते
था क्या अगर न मजाक था I
@ललित 4.4.1991

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