Monday, 10 August 2015

परेशान रात 280615

बहुत परेशा है रात
आंखे बहुत बॊझिल है
इक तूफान सा है सर के अंदर
सांसे भारी है
घरकन तेज़
रुअसा मन
रो देना तो चाहता है
रोता नहीं
डरता है
रो देने से दर्द कम न हो जाये कहीं
पर रुदन की खुशबू सी है कहीं
रो तो रहा है कोई
मुझको यू देख कर
चोटिल कोई और भी है
मेरी इस जर्झारता पर
हर और तेरा अहसास है
माँ।
@lalit 28 june 2015

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