बहुत परेशा है रात
आंखे बहुत बॊझिल है
इक तूफान सा है सर के अंदर
सांसे भारी है
घरकन तेज़
रुअसा मन
रो देना तो चाहता है
रोता नहीं
डरता है
रो देने से दर्द कम न हो जाये कहीं
पर रुदन की खुशबू सी है कहीं
रो तो रहा है कोई
मुझको यू देख कर
चोटिल कोई और भी है
मेरी इस जर्झारता पर
हर और तेरा अहसास है
माँ।
आंखे बहुत बॊझिल है
इक तूफान सा है सर के अंदर
सांसे भारी है
घरकन तेज़
रुअसा मन
रो देना तो चाहता है
रोता नहीं
डरता है
रो देने से दर्द कम न हो जाये कहीं
पर रुदन की खुशबू सी है कहीं
रो तो रहा है कोई
मुझको यू देख कर
चोटिल कोई और भी है
मेरी इस जर्झारता पर
हर और तेरा अहसास है
माँ।
@lalit 28 june 2015
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