Monday, 10 August 2015

दुयाए 280715

इतनी तो बुरी मैं नहीं
तुम्हे भी तो मैंने जन्मा था
हज़ारो बलाऐं ली थी
सैंकड़ो लोरिया गायी थी मैंने
कितनी ही राते जागी थी मैं
तुम्हारे सुकून की नींद के लिए
उंगली पकड़ के चलना सिखाया
भाषा तुम्हारी भी मेरे ही शब्दों से बनी है
पेन्सिल को तेरे और मेरे हाथ साथ साथ पकड़ते थे
तुम कहती हो
कि मुझे बोलने मे पता नहीं लगता
कूछ भी बोल जाती हूँ मैं
हो सकता है तुम ठीक कहती हो
लकिन तुम भूल रही हो
कि तुम जब बड़ी हो रही थी
तो मैं भी तो बदल रही
लड़ रही थी कई युद्ध,
खुद के साथ
लकिन शायद तुम न समझो मेरी बात
दुआएँ है मेरी, कि उम्र दराज़ हो तुमारी
और तुम अपने बच्चों को बड़ा होते देखो
तुम्हारे बूड़े होने तक।
@ललित शर्मा ,28 जुलाई 2015

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