Monday, 10 August 2015

अखबार का दूजा पन्ना 200515

अखबार के दूजे पन्ने पर
सुबह सुबह
कितनी ही तस्वीरे
लोगो की
मुस्कुराती हुई
झांकती हुई
आँखों से बात करती है
आँख मिलाकर
बताती है
चेताती है
कि सब फानी है
हम नहीं रहे
तुम भी नहीं रहोगे
इक तस्वीर बन जाओगे
दूसरे पन्ने की
एक दिन,
पर में नहीं चेतता
कुछ नहीं समझता
पलट देता हु पन्ना
जैसे में जीता रहूँगा
हमेशा .
इन लोगो को भी
जिन की तस्वीरे है आज
चेतताया था
बीते हुये कल को
और तस्वीरो ने
कि जागो
होश करो
यह सब फानी है
पर कब चेते थे यह
कब जागे थे यह
कब रुके थे यह
भागने से
तेज़ ,और तेज़
इसी दिन की तरफ
दोड़ थी बस
अखबार के दूजे पन्ने पर
तस्वीर बन जाने की I
lalit 20.5.2015

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