Saturday, 17 October 2015

tears 290915

When did I grow so old
So old 
Not to be seen to be crying
Who decided
That this age is improper to cry
Why must I
Not let go of the weight
The mega weight
Of drops of salty water
So collected
On the brim of the eye
An aching heart
With muffled sound
Complicates further
The delimma
To keep or
To let it flow...


29 sep 2015

Friday, 16 October 2015

कल सुबह 290915

कल कुछ अलग़ होगा
कल सुबह मै जल्दी उठूँगा
जल्दी,बहुत जल्दी
बहुत काम बाकी है
ज़िन्दगी मे,ज़िन्दगीं के
तोड़ डालूँगा चक्रव्यूह
जो घेरे है मुझको
इस निष्क्रिय को छोड़
बढूंगा आगे
सरपट गति से
भींच के मुठियाँ
कोशिश करूँगा
रोक सकूँ
हाथ से निकलती रेत को
समय की रेत
जो थमी न किसी के थामे
अब बस करूँ
कितना झूठ बोलूगा
खुद् से
और कितना आसान है
अपने से झूठ बोलना
हमेशा,बरबस।
Lalit 29 sep 2015

ए मौला 300915

दिल मे जगह देना मौला
हर किसी लौ समाने की
प्यार बढ़ाने की
कुछ दे पाने की
फिर दे के भुलाने की
इतनी सी जग़ह देना मौला
हर दर्द भुलाने की
एक दर्द घटाने की
जो छूट गया पीछे
उसे साथ मिलाने की
बस इतनी जगह देना मौला
दुआओ मे असर रखना
अपनो की खबर रखना
दूसरो के लिए दर्द रखना
हर ओर अमन रखना
बस इतनी जगह रखना
कोई भी न रहे भूखा
कोई लब न रहे सूखा
हर ओर इनायत हो
हो कहीं भी नहीं धोखा
बस इतनी जगह रखना
एक करुणा की धारा ही
हर और बह निकले
जो मुझ से छु जाये
तुझ ओर बह निकले
तेरे प्यार का अथाह सागर
इस दिल मे समा जाये
बस इतनी जगह रखना
मेरे दिल मे ए मौला।
30 sep 2015

सकीना 011015

हर हुनर से नवाज़ा है तुम्हे
उस खुदा ने
सोच कर तुम्हे
उस खूबसूरत मालिक की
प्रशंसा से भर जाता हूँ
जो कर पाया है रोशन
इक चमकती लौ से
तुम्हारे दिल का हर कोना
कितना मुश्किल होगा
एक ऐसे दिल के साथ जीना
जो हर चीज़ में
खूबसूरती तलाश कर लेता है
1 October 2015

झूठ 061015

झूठ बोलना कितना ज़रूरी है
ज़िंदा रहने के लिये
हर सच घातक है जिंदिगी को,
तोड़ सकता है सब रचाया खेल
तुम्हारा नाम लेना किसी बात मे
नाराज़ कर सकता है किसी आपने को
कितना मुश्किल है जाताना
की अनभिग्य हो तुम
सचाई से।
आपने टूटने की दास्तान
ज़माने को सुनाई तो जा सकती है
पर कैसे जताया जा सकता है
तुम्हे
कि तुम हो शामिल
मेरी बर्बादी में
कितनी आसानी से बोल लेता हु मैं
झूठ
ताकि तुम नाराज़ न होना।
ललित 6 अक्टूबर 2015

अकारण रिश्ते 101015

बहुत सोचा है मैंने
क्यों आता हू तेरी राहो में?
वो जो सवाल तुम मुझ से करती हो
मैंने भी पूछै है खुद से।
क्या कारण है
जो पूछता रहता हू
यू ही फालतू से सवाल
बे मतलब,बे वजह।
सवाल, जो तुम भी जानती हो
कोई मायने नहीं रखते
फिर भी जवाब दे देती हो
रटा रटाया ,मन रखने को।
तुम खोजना चाहती हो
कोई कारन मिल जाये
मेरा ऐसा करने का
मैं भी ढूंढ रहा हू
कारन मेरा ऐसा होने का,
शायद हर सवाल का जवाब नहीं होता
शायद कुछ रिश्ते अकारण ही होते है।
10 oct 2015