Friday, 16 October 2015

झूठ 061015

झूठ बोलना कितना ज़रूरी है
ज़िंदा रहने के लिये
हर सच घातक है जिंदिगी को,
तोड़ सकता है सब रचाया खेल
तुम्हारा नाम लेना किसी बात मे
नाराज़ कर सकता है किसी आपने को
कितना मुश्किल है जाताना
की अनभिग्य हो तुम
सचाई से।
आपने टूटने की दास्तान
ज़माने को सुनाई तो जा सकती है
पर कैसे जताया जा सकता है
तुम्हे
कि तुम हो शामिल
मेरी बर्बादी में
कितनी आसानी से बोल लेता हु मैं
झूठ
ताकि तुम नाराज़ न होना।
ललित 6 अक्टूबर 2015

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