Friday, 16 October 2015

कल सुबह 290915

कल कुछ अलग़ होगा
कल सुबह मै जल्दी उठूँगा
जल्दी,बहुत जल्दी
बहुत काम बाकी है
ज़िन्दगी मे,ज़िन्दगीं के
तोड़ डालूँगा चक्रव्यूह
जो घेरे है मुझको
इस निष्क्रिय को छोड़
बढूंगा आगे
सरपट गति से
भींच के मुठियाँ
कोशिश करूँगा
रोक सकूँ
हाथ से निकलती रेत को
समय की रेत
जो थमी न किसी के थामे
अब बस करूँ
कितना झूठ बोलूगा
खुद् से
और कितना आसान है
अपने से झूठ बोलना
हमेशा,बरबस।
Lalit 29 sep 2015

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