Monday, 10 August 2015

झूठी तलाश 300714

तुम कहाँ रहते हो
यह मुझे पता है
फिर क्यों
ढूंढने का ढोंग
करता हूँ...
मैं हमेशा
दिखाता हूं
दूसरों को
कि व्यस्त हूँ
तुम्हें ढूंढने मे
ताकि
नाकारा ना कहें
मुझे सब.
क्या मकसद
रह जाएगा
मेरे जीवन का,
अगर पहुंच जाऊ
तुम्हारे पास
छु लू तुम्हें
यू ही
हाथ बङा कर.
बस इसी बात से
डरता हूं
भागता फिरता हूँ
यहाँ वहाँ
हर जगह
हर और
नहीं बढ़कर
आ जाता
तुम्हारी और.

30 जुलाई 2014

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