डर 090416
करता न बन
द्रष्टा बन
कहा था किसी भगवान् ने
सुनने मे अच्छा लगा
सदियो से अनुसरण की कोशिश कर रहा है इन्सान
कहाँ हो पाता है यह
कैसे पैदा हो ऐसा विश्वास
कि जो हो रहा है
अच्छा ही है।
पल पल गुजरता
वक़्त डराये रखता है
मजबूर करता है फड़फड़ाने को
फुदकने को इधर से उधर
डर ही तो है
जो हिला देता है
विश्वास उस मालिक पे से।
अजीब विडम्बना है
कहाँ हो पाता है यह
कैसे पैदा हो ऐसा विश्वास
कि जो हो रहा है
अच्छा ही है।
पल पल गुजरता
वक़्त डराये रखता है
मजबूर करता है फड़फड़ाने को
फुदकने को इधर से उधर
डर ही तो है
जो हिला देता है
विश्वास उस मालिक पे से।
अजीब विडम्बना है
डर खुदा से बलवान हो गया !
Lalit 9 april 2016
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