Monday, 13 June 2016

मत छुओ 06042016

मत छुओ   06042016


मत छुओ
सबसे अच्छा है।
हाथ लगा के यू
हैरान क्यों हो?
चोंक गये हो
छेद देख कर इस काया मे ?
तुम्हारे चहरे पे
परेशानी?
विस्मित हो,
कैसे चलता हूँ
इतने छेद लिये?
और तुम्हारी आँखों मे
यह भाव
की तुम्हे पता ही नहीं,
यह कब होता गया
कब एक पूर्ण काया
छेदों का मुजस्मा हो गई।
यह जहा तुम्हारी अनामिका टिकी है ना
बना था यह सुराख़
जब पहली बार तुमने मुझे
झूठा कहा था
ध्यान से देखो
वक़्त के साथ यह आर पार हो गया
बहुत समय गुज़रा है ना
मेरा तुम्हारा इकठे।
ये छोटे छोटे अनगिनित निशान
कुछ नहीं
तुम्हारी ज़िद् है
ज़िद भी बहुत करते थे न तुम
बेकार बातो मे।
छोड़ो किन बातो मे पड़ गए हम
यह तो जीवन है
गुज़र ही जाता है
हंसते या रोते।
पर तुम ऐसे हैरान न हुआ करो
मन दुखता है।

ललित 6 अप्रैल 2016

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