हार 200316
डरे हुयों की बस्ती में
तुम अलख जगाने निकले हो!
जो जन्मों से मुर्दा है
उनको उठाने निकले हो!
तुमसे पहले कितने ही
हार गये इन लोगो से
यह ज़हर के आदी बैठे है
तुम अमृत पिलाने निकले हो!
घुटनो पे रेंगने को
यह जीवन समझे बैठे है
रीड़ इनकी गायब है
इन्हे दौड़ सिखाने निकले हो!
जिंदगी आसां करने को
जो जूठन पर पलते है
मुर्दो को जो खाते है
उन्हे शेर बनाने निकले हो!
यह डरते है तुमसे भी
डर ही इनकी फितरत है
यह तुमको मार गिरा देंगे
जिन्हे इंसान बनाने निकले हो!
Lalit 20 march 2016
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