जिंदिगी की किताब 200316
ज़िन्दगी की किताब के पन्ने
पलट के देख ज़रा
हर्फ़ दर हर्फ़ दाखिल है
किस सफाई से
जो आज हो रहा है
जुड़ा है धागों से
कही बहुत पीछै
दूर माज़ी से।
रिसता सुलगता
जो तुमको दिखता है
बड़े सलीके से
मैंने संभाल रखा था
यह दर्द समेट के
संजोय रखा था
बांध के आज
सूंदर धागों से
दबा दिया है
सोंधी मिटटी मे
वक़्त के साथ
फिर अंकुर फूटेगे
लताये निकलेगी
जिंदिगी की किताब
के पन्नों से होते हुये
इनमे कभी फ़ूल महकेंगे
महक जो रूह को कभी छु जायगी
वहां बैठ कर माज़ी को जब तुम देखोगे
आज के दिन का पन्ना
बहुत कह देगा।
ज़िन्दगी की किताब के पन्ने
पलट के देख ज़रा
हर्फ़ दर हर्फ़ दाखिल है
किस सफाई से
जो आज हो रहा है
जुड़ा है धागों से
कही बहुत पीछै
दूर माज़ी से।
रिसता सुलगता
जो तुमको दिखता है
बड़े सलीके से
मैंने संभाल रखा था
यह दर्द समेट के
संजोय रखा था
बांध के आज
सूंदर धागों से
दबा दिया है
सोंधी मिटटी मे
वक़्त के साथ
फिर अंकुर फूटेगे
लताये निकलेगी
जिंदिगी की किताब
के पन्नों से होते हुये
इनमे कभी फ़ूल महकेंगे
महक जो रूह को कभी छु जायगी
वहां बैठ कर माज़ी को जब तुम देखोगे
आज के दिन का पन्ना
बहुत कह देगा।
ललित,20 march 2016
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