अपने ही घर मैं अजनबी हो जाता है कोई
अनजान चहरे ,वीरान आँखे
अपरिचित बोली,अंजाने ख्याल
इंट इंट लगा कर तामीर किया घर
हँसता है मुझपर,ज़ोर ज़ोर से
वो पसीना,वो खून बहाया किसके लिये
वोह जो अपनी ख्वाहिशो की कटौती की
किसी काम न आयी
सब चहरे अजनबी हिसाब मांगते है
उस लेख का,जिसमे उनका कोई जोड़ नहीं
जिंदिगी के नाम का यह मज़ाक
यु ही चलता रहा है सदियो से
यु ही चलता रहेगा हमेशा
मेरे साथ भी
मेरे बिना भी।
अनजान चहरे ,वीरान आँखे
अपरिचित बोली,अंजाने ख्याल
इंट इंट लगा कर तामीर किया घर
हँसता है मुझपर,ज़ोर ज़ोर से
वो पसीना,वो खून बहाया किसके लिये
वोह जो अपनी ख्वाहिशो की कटौती की
किसी काम न आयी
सब चहरे अजनबी हिसाब मांगते है
उस लेख का,जिसमे उनका कोई जोड़ नहीं
जिंदिगी के नाम का यह मज़ाक
यु ही चलता रहा है सदियो से
यु ही चलता रहेगा हमेशा
मेरे साथ भी
मेरे बिना भी।
17 sep 2015
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