Friday, 18 September 2015

घर में अजनबी 170915

अपने ही घर मैं अजनबी हो जाता है कोई
अनजान चहरे ,वीरान आँखे
अपरिचित बोली,अंजाने ख्याल
इंट इंट लगा कर तामीर किया घर
हँसता है मुझपर,ज़ोर ज़ोर से
वो पसीना,वो खून बहाया किसके लिये
वोह जो अपनी ख्वाहिशो की कटौती की
किसी काम न आयी
सब चहरे अजनबी हिसाब मांगते है
उस लेख का,जिसमे उनका कोई जोड़ नहीं
जिंदिगी के नाम का यह मज़ाक
यु ही चलता रहा है सदियो से
यु ही चलता रहेगा हमेशा
मेरे साथ भी
मेरे बिना भी।
17 sep 2015

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