आ जाता है है वो दिन
साल के बाद दोबारा
वो तारीख जिसकी प्रतीक्षा
मेरी माँ बहुत ख़ुशी से करती थी
कितनी ही त
तैयारियां होती थीं
नये कपड़े,खिलौने,मिठाई
दोस्तों को बुला कर
सूंदर से केक की कटाई
साल के बाद दोबारा
वो तारीख जिसकी प्रतीक्षा
मेरी माँ बहुत ख़ुशी से करती थी
कितनी ही त
तैयारियां होती थीं
नये कपड़े,खिलौने,मिठाई
दोस्तों को बुला कर
सूंदर से केक की कटाई
कुछ बड़ा होने पर
सब अजीब सा लगता था
मना कर देता था माँ को
समागम करने से
पर वो ज़िद कर
मना ही लेती थी मुझको यह कहकर कि
मैं नहीं हूँगी तो मत मनाना।
सब अजीब सा लगता था
मना कर देता था माँ को
समागम करने से
पर वो ज़िद कर
मना ही लेती थी मुझको यह कहकर कि
मैं नहीं हूँगी तो मत मनाना।
अब मेरे जनम दिन पर
रसमें निभाई तो जाती है
अजनबी चेहरे
अभिवादन भी करते है
पर वो भाव कहीं नहीं दिखता
जो होता था मेरी माँ की आँखों मे।
रसमें निभाई तो जाती है
अजनबी चेहरे
अभिवादन भी करते है
पर वो भाव कहीं नहीं दिखता
जो होता था मेरी माँ की आँखों मे।
22 sep 2015
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