Tuesday, 15 September 2015

भेल का पत्ता

झूल रहा था हवाओ मे मैं,
इक डाल पर
तुमने सुना था ,शिव को पसंद है
बेल वृक्ष का पत्ता
तोडा मुझे ,औरो के संग
रख दिया
शिवालय के बाहर,
दूसरो के चढ़ाने के लिये
परोपकारी ओर दानी हो गये तुम
आते रहे, उठाकर देखते रहे
और वही छोड़ देते रहे,
अनेक भक्त
पर नहीं चढ़ाया मुझे शिवलिंग पर,
क्योंकि थोडा खंडित था मैं।
मेरी अपूर्णता भी तो उसकी थी,
वही तो रचयता है
पूर्ण और अपूर्ण का
जितनी मेरी चाह थी
उसे पाने की,
उतनी ही तड़प थी,
उसमे मुझे अपनाने की
और वो शिव दिन भर इंतज़ार मे
रहा मेरे,
कि सफ़र पूरा हो मेरा
उस परमात्मा से मिलने का
धन्य हो जाये  प्रभु
अपने भक्त को पाकर।

No comments:

Post a Comment