Tuesday, 4 October 2016

दादी 280916

दादी  280916


वो पुराने घर का दरवाज़ा
अभी भी तो वैसा है
जैसा पास बैठ कर तुमने बनवाया था
कितने रंग भरे थे
हम सब ने मिल कर
वो अलग अलग रंगो की छोटे छोटे डिब्बे
और वो ब्रश भी तो थे
सुबह उठ कर ,धुप होने तक
रंग भरे थे
हम सब ने।
वक़्त के साथ जमी धुल को धोने का भी तो
उत्सव होता था ना
कहाँ मालूम है
तुम्हारे नातियों को।
सभी चेहरे अजनबी है
उनके लिये
मेरे और तुम्हारे सिवा।
आज जब कभी
वोह यह किवाड़ खोलते है
नहीं जान पाते
वो यह कहानियां।
तुम होती तो सुना देती
कुछ तो दादी के ही फ़र्ज़ होते है।


28 sep 2016

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