Tuesday, 4 October 2016

प्यार 270916

प्यार 270916


तुम्हे देख लेना तो ज़रूरी नहीं
सब रिश्ते आँखों से नहीं बनते
कुछ रूहे यू ही जुडी होती है।
दोष तुम्हारा भी नहीं
दुनिया का चलन ही ऐसा है
बे कारण के रिश्ते
कौन समझ पाया है
संकुचित सोच के संकुचित मालिक
हर बात मे ढूंढते है
नफा या नुक्सान
यही तो होता आया है
सदियो से
कितना मुश्किल है मानना वो
जो नहीं उतरता हमारे
माप ढंढो मे।
कितनी आसानी से दर किनार कर देते है उसे
जो सभ्यता,
नहीं मानती।
सुनो ,
कभी दिल की सुन कर भी देखो
सही और गलत की परिभाषा के परे
यह अलग ही राग अलापता है
चीख उठता है
प्यार पाने को,
नहीं समझता
यह दीवारे
यह मजबूरिया
कभी सुन सको तो सुनो।


27 sep 2016

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