Wednesday, 18 November 2015

रिफ्यूजी 2 141115

समुद्र तट पर तैर कर पहुँची यह लाश
मेरे जैसे ही किसी बाप के बेटे की है
किसी माँ ने जल्दी जल्दी मे पहनाये जो कपड़े
लम्बे सफ़र पर जाने के लिए
अच्छे भले घर मे जन्मा,खुशियों का पुलंदा
आँखों का तारा, राज दुलारा
यू औंदा पड़ा है रेत पर ,ढेर
निर्जीव
मानवता के हाथों बलि चढ़ि मानवता
अजब हो रहा है यह खेल
शरण ढूंढने निकला जो -परिवार के साथ
सुना था सूंदर दुनिया है,सूंदर सिरजनहार की
पर मौत पाई
धर्म,रंग,देश के नाम पर।
चेतो इंसानो, कुछ शर्म करो
मत सहो अत्याचार
मत करो अत्याचार
जिससे मानवता शर्मिंदा रहे
सदियो तक !

14 nov 2015


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