ज़िन्दिगी कितनी खूबसूरत है।
पत्थर को तराश कर
खुदा करने वाला
खुद ही उसे तोड़ देता है।
अहम है या भ्रम ?
कहना मुश्किल है।
खुदा करने वाला
खुद ही उसे तोड़ देता है।
अहम है या भ्रम ?
कहना मुश्किल है।
एक एक पत्थर चुन कर
प्यार से ताबीर किया
मंदिर
सहज सहज सँवारी मूरत
उन्ही हाथो तो उबरी थी
चाहा भी था
पूजा भी था
प्यार से ताबीर किया
मंदिर
सहज सहज सँवारी मूरत
उन्ही हाथो तो उबरी थी
चाहा भी था
पूजा भी था
किसी का अहम तो ज़रूर रहा होगा
पूज्य का
या पूजने वाले का
पूज्य का
या पूजने वाले का
तभी तो रिश्ता मिटाना पड़ा
मिट्टी मे मिला कर
वो सब
जो जीवन भर की पूंजी थी।
मिट्टी मे मिला कर
वो सब
जो जीवन भर की पूंजी थी।
वक़्त के साथ बहुत कुछ् बदल जाता है।
ललित 5 Dec 2017
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