यह अंधेरी जगह क्या है
और ठंडी भी
मैं हिल नही पा रहा
कहा हू मैं?
कोई आवाज़ नही
मौत सा सन्नाटा..
ओह,
याद आया
मर गया था मैं,
नश्वर शरीर को छोड़ कर
अलौकिक की और कि यात्रा।
चाहने वाले कहाँ है
कहाँ है सब....
अरे,
किसी हस्पताल का
मुर्दा घर है
यही छोड़ गये मुझे
मेरे अपने।
मैंने कहा भी था
ऐसा मत करना
मुझे डर लगता है
तंग जगाहों से।
पर उनकी भी
शायद मजबूरी थी
बहुत पढ़ाया था
जिन बच्चो को
उन्हे आने मे
वक़्त तो लगेगा।
बहुत दूर रहते है ना वोह।
कितने ही काम
कितनी ही मजबूरिया।
मैंने ही तो चाहा था
बहुत अच्छा करे वो
स्वतंत्र रहे
उड़े बड़े आसमान मे
बिना फिक्र के।
मैंने ही तो चाहा था
मैं कभी बेड़ी न बनु उनके लिये।
मैंने ही तो बताया था उन्हे
की तुम अपनी ज़िंदगी जिओ
मैं आराम से
रह लूँगा
जी लूँगा
उनसे दूर,
उनकी भी क्या गलती,
मैं बताना ही भूल गया
अकेले जीने की बात हुई था।
मारने की नहीं।।
Lalit @8 feb 2022
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